Advertisement

मलखाचक का गांधी कुटीर बदहाल, संरक्षण का इंतजार | सारण

 गाँधी जयंती पर विशेष 

जहां कभी गूंजती थी चरखे की आवाज, आज संरक्षण को तरस रहा गांधी कुटीर

1918 में सारण पहुंचे थे महात्मा गांधी, मलखाचक में कभी चलते थे सैकड़ों करघे; गांधी जयंती पर फिर उठी ऐतिहासिक विरासत बचाने की मांग

आलेख | धर्मेन्द्र रस्तोगी

मलखाचक स्थित ऐतिहासिक गांधी कुटीर का जर्जर भवन, सारण

छपरा, 02 अक्टुबर | सारण की धरती स्वतंत्रता आंदोलन की कई महत्वपूर्ण स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है। इसी विरासत का एक महत्वपूर्ण पड़ाव दिघवारा प्रखंड का मलखाचक है, जहां महात्मा गांधी से जुड़ी स्मृतियों के साथ खादी और स्वदेशी आंदोलन की कहानी भी जुड़ी है। कभी यहां चरखे और करघों की आवाज सुनाई देती थी, लेकिन आज गांधी की स्मृति में बना गांधी कुटीर खुद संरक्षण का इंतजार कर रहा है।

गांधी जयंती पर हर साल गांधी कुटीर में कार्यक्रम और माल्यार्पण होता है। गांधीजी के विचारों को याद किया जाता है, लेकिन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण का सवाल फिर पीछे छूट जाता है। जर्जर होती इमारत इस बात की ओर ध्यान खींचती है कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी स्थानीय विरासतों को सुरक्षित रखने के लिए स्थायी प्रयास की जरूरत है।

1918 में सारण पहुंचे थे महात्मा गांधी 

सारण के मलखाचक में गांधी कुटीर, स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत

सारण का स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव काफी पुराना रहा है। चंपारण सत्याग्रह के दौर से ही बिहार में राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियां तेज थीं। मौलाना मजहरुल हक, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और ब्रजकिशोर प्रसाद जैसे नेताओं की सक्रियता ने बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत आधार दिया।

इसी ऐतिहासिक दौर में 1918 में महात्मा गांधी के सारण पहुंचने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद असहयोग आंदोलन और अंग्रेजी शासन के विरोध में जिले की भागीदारी और तेज हुई। वर्ष 1920 में गांधीजी के छपरा आगमन के दौरान उनके स्वागत में प्राचार्य मनोरंजन द्वारा रचित ‘फिरंगिया’ गीत का उल्लेख भी स्थानीय इतिहास में मिलता है।

मलखाचक में चलते थे करीब 400 करघे

दिघवारा का मलखाचक खादी और स्वदेशी आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में यहां और आसपास के इलाकों में करीब 400 करघों के संचालन का उल्लेख मिलता है।

उस दौर में चरखा और करघा सिर्फ रोजगार का साधन नहीं थे। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने के आंदोलन में इन्हें प्रतिरोध के प्रतीक के तौर पर देखा जाता था। मलखाचक में तैयार होने वाली खादी के राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का भी उल्लेख मिलता है।

स्वतंत्रता सेनानी बाबू राम विनोद सिंह, डॉ. सत्यनारायण तथा वीरांगना शारदा और सरस्वती जैसी हस्तियों का नाम भी इस आंदोलन से जोड़ा जाता है। महात्मा गांधी से जुड़े मलखाचक के प्रसंग का उल्लेख केएम मुंशी की पुस्तक ‘थ्री मंथ्स ऑफ महात्मा गांधी’ में होने की बात भी सामने आती है।

गांधी के साथ भगत सिंह की स्मृतियां भी

मलखाचक की ऐतिहासिक पहचान केवल गांधीजी तक सीमित नहीं है। स्थानीय इतिहास में सरदार भगत सिंह के यहां आने की भी चर्चा मिलती है। साइमन कमीशन के विरोध के दौरान उनके मलखाचक पहुंचने और क्रांतिकारी योगेंद्र शुक्ल से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख स्थानीय स्मृतियों में मिलता है।

इन प्रसंगों के कारण मलखाचक की विरासत का एक अनूठा पक्ष सामने आता है। एक ओर यहां गांधी की अहिंसा और स्वदेशी की विचारधारा से जुड़ी स्मृतियां हैं, तो दूसरी ओर क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े प्रसंग भी स्थानीय इतिहास का हिस्सा हैं।

1950 में बना गांधी कुटीर, अब जर्जर

सारण के मलखाचक में गांधी कुटीर, स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत

स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी की स्मृति को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से वर्ष 1950 में गांधी कुटीर के निर्माण का उल्लेख मिलता है। लंबे समय तक यह स्थान स्वतंत्रता सेनानियों, उनके परिजनों और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण रहा।

समय के साथ गांधी कुटीर की स्थिति खराब होती गई। आग से क्षतिग्रस्त होने के बाद इसके अपेक्षित जीर्णोद्धार का सवाल भी सामने आया। इस विरासत को संभालने वाले कई लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं।

यह भी पढ़ें: मलखाचक की सरस्वती-शारदा: अंग्रेजों के खिलाफ नाबालिग बहनों का साहस

डॉ. सत्यनारायण के निधन के बाद गांधी कुटीर की देखरेख और संरक्षण की जिम्मेदारी और महत्वपूर्ण हो गई। रामविनोद सिंह के पुत्र जनार्दन सिंह और डॉ. सुरेंद्र के जीवनकाल तक गांधी कुटीर से जुड़ी स्मृतियों और गतिविधियों को जीवित रखने के प्रयास किए जाते रहे।

खादी का इतिहास बचा, लेकिन चरखे-करघे गायब

गांधीजी के नाम पर आज भी स्वदेशी और खादी की बातें होती हैं, लेकिन मलखाचक की पुरानी खादी संस्कृति धीरे-धीरे कमजोर होती गई। कभी जिन चरखों और करघों से स्वदेशी आंदोलन को ताकत मिली थी, वे अब उस रूप में दिखाई नहीं देते।

दिघवारा का गांधी चबूतरा, बगही का गांधी मैदान और जिले के दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े स्थल भी इस विरासत को संरक्षित करने की जरूरत की याद दिलाते हैं।

सोनपुर में स्वतंत्रता सेनानी शिववचन सिंह, नयागांव में शहीद राजेंद्र सिंह और दिघवारा में रामविनोद सिंह की प्रतिमाएं भी स्वतंत्रता आंदोलन की स्थानीय स्मृतियों को जीवित रखने का प्रयास हैं।

गांधी जयंती पर सिर्फ माल्यार्पण नहीं, संरक्षण की जरूरत

गांधी कुटीर की स्थिति सिर्फ एक पुराने भवन की समस्या नहीं है। यह उस इतिहास को संरक्षित करने का सवाल है, जिसे आने वाली पीढ़ियां किताबों से आगे जाकर देख और समझ सकती हैं।

जरूरत है कि गांधी कुटीर का जीर्णोद्धार कराया जाए, इससे जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों और दस्तावेजों को व्यवस्थित तरीके से संरक्षित किया जाए और इसे ऐसे स्मृति स्थल के रूप में विकसित किया जाए, जहां युवा स्वतंत्रता आंदोलन, गांधीजी के विचार, स्वदेशी और खादी के इतिहास को करीब से समझ सकें।

यह भी पढ़ें: सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र चुनाव 2026: 23 अक्टूबर को मतदान

जिस मलखाचक में कभी चरखे और करघों की आवाज गूंजती थी, वहां आज उस विरासत को बचाने की आवाज उठ रही है। गांधी जयंती पर सवाल यही है कि क्या ऐतिहासिक स्थलों को केवल साल में एक दिन माल्यार्पण तक सीमित रखा जाएगा या उनकी विरासत को स्थायी रूप से संरक्षित करने की दिशा में भी कदम उठेंगे?




एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ