मलखाचक की सरस्वती और शारदा का साहस: अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठी दो बेटियों की आवाज
पिता की गिरफ्तारी के बाद नाबालिग बहनों ने संभाली भारत छोड़ो आंदोलन की कमान, दिघवारा थाने पर तिरंगा फहराने के लिए निकला जनसैलाब
विशेष आलेख | धर्मेन्द्र रस्तोगी
आज जब हम आजादी के 80वें वर्ष में तिरंगे को सम्मान के साथ देखते हैं, तो उसके पीछे छिपे संघर्ष की अनगिनत कहानियां भी याद आती हैं। स्वतंत्रता की यह कहानी सिर्फ महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह या अन्य बड़े नेताओं तक सीमित नहीं थी। देश के गांवों और कस्बों में भी ऐसे अनगिनत लोग थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई और अपने साहस से इतिहास रचा।
सारण का मलखाचक भी ऐसी ही वीर गाथाओं को अपने भीतर समेटे हुए है।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इसी गांव की दो नाबालिग बेटियों सरस्वती और शारदा ने अपने साहस से अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। पिता की गिरफ्तारी के बाद दोनों बहनों ने आंदोलन की कमान संभाली और दिघवारा थाने की ओर बढ़े आंदोलनकारियों का नेतृत्व किया। उनकी कहानी स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं और नाबालिगों की भागीदारी का एक प्रेरक अध्याय है।
पिता की गिरफ्तारी के बाद बेटियों ने थामा संघर्ष
महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद अगस्त क्रांति की ज्वाला पूरे देश में फैल चुकी थी। बिहार का सारण जिला भी इस राष्ट्रीय चेतना और जनाक्रोश का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा था।
सन 1942 में अंग्रेजी हुकूमत ने सारण के मलखाचक गांव से स्वतंत्रता सेनानी रामविनोद सिंह को गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजों को लगा कि एक प्रमुख आंदोलनकारी की गिरफ्तारी से इलाके में चल रहा आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा।
लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों का यह अनुमान गलत साबित हुआ।
पिता की गिरफ्तारी के बाद उनकी दोनों नाबालिग बेटियों सरस्वती और शारदा ने बिना किसी भय के आंदोलन को आगे बढ़ाने का फैसला किया। दोनों बहनों ने न केवल अपने परिवार और गांव के लोगों का मनोबल बनाए रखा, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के आंदोलनकारियों को भी संगठित करना शुरू किया।
उम्र छोटी थी, लेकिन आजादी के लिए उनका संकल्प बेहद मजबूत था।
दिघवारा थाने पर तिरंगा फहराने का संकल्प
पिता की गिरफ्तारी के बाद सरस्वती और शारदा ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष को और तेज करने का निर्णय लिया। उनके आह्वान पर दिघवारा थाना की ओर कूच करने की योजना बनी।
इस आंदोलन की सबसे खास बात यह थी कि इसकी पहली पंक्ति में महिलाओं का जत्था था और उसका नेतृत्व स्वयं सरस्वती और शारदा कर रही थीं।
महिलाओं के पीछे बड़ी संख्या में स्थानीय पुरुष, किसान और युवा भी जुटते गए। देखते ही देखते आंदोलनकारियों का जनसैलाब दिघवारा थाना परिसर की ओर बढ़ने लगा।
आंदोलनकारियों का उद्देश्य स्पष्ट था अंग्रेजी प्रशासनिक सत्ता के प्रतीक माने जाने वाले थाने पर अपना अधिकार जताना और वहां तिरंगा फहराकर ब्रिटिश शासन की सत्ता को चुनौती देना।
पुलिस लाठीचार्ज, भगदड़ और घायल हुए आंदोलनकारी
थाना परिसर की ओर बढ़ती भीड़ और नाबालिग लड़कियों के नेतृत्व को देखकर ब्रिटिश पुलिस बल ने आंदोलनकारियों को रोकने की कोशिश की।
निहत्थे जनसमूह पर पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया। अचानक हुए इस बल प्रयोग से मौके पर अफरातफरी और भगदड़ की स्थिति पैदा हो गई।
पुलिस की लाठियों के प्रहार के बावजूद सरस्वती और शारदा पीछे नहीं हटीं।
इस घटना में दो दर्जन से अधिक आंदोलनकारी गंभीर रूप से घायल हुए। इसके बावजूद आंदोलनकारियों के तेवर ढीले नहीं पड़े।
अंततः पुलिस ने सरस्वती और शारदा को अन्य प्रमुख सहयोगियों के साथ गिरफ्तार कर लिया और उन्हें जेल भेज दिया।
नाबालिग उम्र में दोनों बहनों का जेल जाना क्षेत्र में आक्रोश की एक नई लहर का कारण बना।
युवा नेतृत्व ने पूरे जिले में जगाई आंदोलन की चेतना
उस दौर में सारण जिले में आंदोलन की कमान युवा और ऊर्जावान कांग्रेस नेताओं के हाथों में थी। कुमार कालिका सिंह, शंकरनाथ विद्यार्थी, कृपा सिंह, जगन्नाथ सिंह और कपिलदेव प्रसाद श्रीवास्तव जैसे नेताओं ने छपरा शहर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में जनआंदोलन को संगठित और व्यापक रूप दिया।
सारण के साथ-साथ मांझी, दिघवारा, मैरवा और सिवान जैसे इलाकों में भी जनता की बढ़ती भागीदारी अंग्रेज प्रशासन के लिए चुनौती बन चुकी थी।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन अंग्रेज कलक्टर ने तिरहुत कमिश्नर को पत्र भेजकर जिले की कानून-व्यवस्था को लेकर गहरी चिंता जताई थी।
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. के. के. दत्त की पुस्तक द फ्रीडम मूवमेंट इन बिहार में इस पत्राचार का उल्लेख मिलता है। कलक्टर के पत्र में प्रशासनिक स्थिति के बिगड़ने और जिले में किसी बड़े जनविद्रोह या गंभीर घटना की आशंका व्यक्त की गई थी।
छपरा शहर में ठप हुआ प्रशासन
12 अगस्त 1942 का दिन सारण के प्रशासनिक इतिहास में भी एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया।
उस दिन पूरा छपरा शहर स्वतःस्फूर्त बंद की स्थिति में था। बाजार बंद रहे, सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा और सरकारी कार्यालयों का कामकाज पूरी तरह प्रभावित हुआ।
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आंदोलनकारियों ने छपरा कलेक्ट्रेट, सिविल कोर्ट और मुख्य डाकघर जैसी महत्वपूर्ण सरकारी इमारतों की ओर कूच किया। वहां ब्रिटिश झंडे को हटाकर तिरंगा फहराया गया।
सरकारी भवनों पर राष्ट्रध्वज का लहराना अंग्रेजी शासन के लिए खुली चुनौती थी। इससे प्रशासनिक अधिकारियों में भय और बेचैनी का माहौल पैदा हो गया।
वकीलों ने भी आंदोलन में उतरने का लिया फैसला
इसी ऐतिहासिक दिन छपरा बार एसोसिएशन की एक आपात बैठक आयोजित की गई।
बैठक में वरिष्ठ अधिवक्ता सुखदेव नारायण मेहता ने प्रस्ताव रखा कि वकीलों को अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों और अदालती कामकाज को छोड़कर पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो जाना चाहिए।
इस प्रस्ताव को वकीलों ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया।
यह घटना इस बात का प्रमाण थी कि अगस्त क्रांति का प्रभाव समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंच चुका था। किसान, युवा, महिलाएं, वकील और आम नागरिक सभी अपने-अपने तरीके से अंग्रेजी शासन के खिलाफ खड़े हो रहे थे।
अगस्त क्रांति का संदेश: आम जनता का सामूहिक संकल्प
12 अगस्त 1942 को सारण में घटी घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि भारत की आजादी केवल बड़े नेताओं के भाषणों या राजनीतिक वार्ताओं का परिणाम नहीं था।
इस स्वतंत्रता के पीछे देश के छोटे शहरों, गांवों, किसानों, महिलाओं, वकीलों, युवाओं और नाबालिग बच्चों तक का संघर्ष और बलिदान था।
मलखाचक की सरस्वती और शारदा इसी सामूहिक संघर्ष की प्रतीक हैं।
उनकी कहानी आज भी यह संदेश देती है कि जब देश और समाज के सामने अन्याय और गुलामी की चुनौती हो, तब उम्र और परिस्थितियां साहस के रास्ते में बाधा नहीं बनतीं।
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आजादी के 80 वर्ष बाद जब हम तिरंगे को सलाम करते हैं, तब उन अनगिनत लोगों को याद करना भी जरूरी है, जिन्होंने इस तिरंगे को सम्मान के साथ लहराने का अधिकार हमें दिलाया।
मलखाचक की सरस्वती और शारदा की कहानी उसी अमर विरासत की एक प्रेरक कड़ी है—एक ऐसी कहानी, जिसमें उम्र छोटी थी, लेकिन हौसला बहुत बड़ा था।


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