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छपरा सदर अस्पताल में क्लबफुट का आधुनिक उपचार शुरू

छपरा सदर अस्पताल में जन्मजात क्लबफुट का आधुनिक पोंसेटी पद्धति से इलाज शुरू, बिना बड़े ऑपरेशन बच्चों को मिल रही नई उम्मीद

#छपरा | जन्म से टेढ़े पैरों (क्लबफुट) की समस्या से पीड़ित बच्चों के लिए छपरा सदर अस्पताल से राहत भरी खबर है. अब अस्पताल में आधुनिक पोंसेटी पद्धति (Ponseti Method) के माध्यम से जन्मजात क्लबफुट का उपचार शुरू किया गया है. इस पद्धति में बिना बड़े ऑपरेशन के सीरियल प्लास्टर कास्टिंग के जरिए बच्चों के पैरों की विकृति को धीरे-धीरे ठीक किया जाता है. चिकित्सकों का कहना है कि यदि जन्म के तुरंत बाद या शुरुआती महीनों में उपचार शुरू हो जाए तो अधिकांश बच्चों के पैर पूरी तरह सामान्य हो सकते हैं.

Clubfoot treatment at Chapra Sadar Hospital.

विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में शुरू हुआ उपचार

सदर अस्पताल में आयोजित विशेष उपचार सत्र के दौरान जन्मजात क्लबफुट से प्रभावित बच्चों की जांच की गयी. विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. रवि अमृत ने प्रत्येक बच्चे के पैरों का विस्तृत परीक्षण कर उनकी स्थिति का आकलन किया और पोंसेटी पद्धति के तहत उपचार शुरू कराया.

उपचार के पहले चरण में बच्चों के पैरों पर सीरियल प्लास्टर कास्टिंग की गई. इस प्रक्रिया में हर सप्ताह विशेष तकनीक से प्लास्टर बदला जाता है, जिससे पैरों की विकृति धीरे-धीरे कम होकर सामान्य आकार लेने लगती है. चिकित्सकों के अनुसार नियमित उपचार और समय पर फॉलोअप से अधिकांश बच्चों में कुछ ही सप्ताह के भीतर सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं.

 क्या है जन्मजात क्लबफुट?

क्लबफुट एक जन्मजात विकृति है, जिसमें नवजात शिशु का एक या दोनों पैर अंदर की ओर मुड़े हुए होते हैं. यदि समय पर इलाज नहीं कराया जाए तो बच्चे के चलने-फिरने में गंभीर परेशानी हो सकती है और आगे चलकर स्थायी दिव्यांगता का खतरा भी बढ़ जाता है.

विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या पूरी तरह ठीक की जा सकती है, बशर्ते इसकी पहचान समय रहते हो और उपचार जन्म के शुरुआती सप्ताहों में शुरू कर दिया जाए.

Clubfoot treatment at Chapra Sadar Hospital.

पोंसेटी पद्धति क्यों मानी जाती है सबसे प्रभावी?

चिकित्सकों के अनुसार क्लबफुट के उपचार के लिए पोंसेटी पद्धति को दुनिया भर में 'गोल्ड स्टैंडर्ड' माना जाता है. इस तकनीक में बड़े ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ती. क्रमिक प्लास्टर, जरूरत पड़ने पर छोटी सर्जिकल प्रक्रिया (टेनोटॉमी) तथा उसके बाद विशेष ब्रेस (जूता) के उपयोग से बच्चों के पैरों को सामान्य स्थिति में लाया जाता है.

यह उपचार कम खर्चीला, सुरक्षित और अत्यधिक सफल माना जाता है. यही कारण है कि अब सरकारी अस्पतालों में भी इस पद्धति को प्राथमिकता दी जा रही है.

अनुष्का फाउंडेशन ने बढ़ाया सहयोग का हाथ

उपचार अभियान में सामाजिक संस्थाओं का सहयोग भी देखने को मिला 'अनुष्का फाउंडेशन' की प्रतिनिधि वंशिता चौरसिया ने 0 से 2 वर्ष तक के क्लबफुट प्रभावित बच्चों के उपचार में उपयोग होने वाली आवश्यक सामग्री निःशुल्क उपलब्ध कराई.

इस पहल से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिली और बच्चों का इलाज बिना अतिरिक्त आर्थिक बोझ के शुरू किया जा सका.

आरबीएसके और डीईआईसी की रही अहम भूमिका

इस अभियान में 'राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके)' की टीम तथा 'डीईआईसी' के डॉ. जितेंद्र झा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. टीम ने प्रभावित बच्चों की पहचान, परामर्श और उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित की. आवश्यकता पड़ने पर बच्चों को बेहतर एवं विशेष उपचार के लिए जिला अस्पताल, सिवान रेफर करने की भी व्यवस्था की गई है.

Clubfoot treatment at Chapra Sadar Hospital.

अभिभावकों से समय पर जांच कराने की अपील

सिविल सर्जन डॉ. राजकुमार चौधरी ने कहा कि कई बार अभिभावक जन्म से टेढ़े पैर को सामान्य समझकर इलाज में देरी कर देते हैं, जिससे समस्या गंभीर हो जाती है. उन्होंने अपील की कि यदि किसी नवजात के एक या दोनों पैर असामान्य रूप से मुड़े हुए दिखाई दें तो बिना देर किए सरकारी अस्पताल या विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करें.

उन्होंने कहा कि जन्म के शुरुआती सप्ताहों में उपचार शुरू होने पर सफलता की संभावना सबसे अधिक रहती है और बच्चे भविष्य में सामान्य जीवन जी सकते हैं.

बच्चों के बेहतर भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

अस्पताल प्रबंधक राजेश्वर प्रसाद ने बताया कि सदर अस्पताल की यह पहल केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि जन्मजात क्लबफुट से पीड़ित बच्चों को सामान्य जीवन देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. विशेषज्ञ चिकित्सकों, स्वास्थ्य विभाग, आरबीएसके, डीईआईसी तथा सामाजिक संगठनों के संयुक्त प्रयास से अब ऐसे बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की उम्मीद और मजबूत हुई है.

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उन्होंने कहा कि समय पर पहचान, नियमित उपचार और अभिभावकों की जागरूकता से क्लबफुट जैसी जन्मजात विकृति पर प्रभावी ढंग से नियंत्रण पाया जा सकता है. सदर अस्पताल में उपलब्ध यह सुविधा जिले के जरूरतमंद परिवारों के लिए बड़ी राहत साबित होगी.

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