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भिखारी ठाकुर आज भी क्यों हैं प्रासंगिक? 55वीं पुण्यतिथि पर विशेष

भिखारी ठाकुर आज भी क्यों हैं प्रासंगिक? 55वीं पुण्यतिथि पर विशेष 

विशेष लेख | लेखक: प्रो॰ डॉ॰ लालबाबू यादव

10 जुलाई 2026 | आज भोजपुरी के महान लोक कलाकार, नाटककार और भोजपुरी साहित्य के महान हस्ताक्षर भिखारी ठाकुर की 55वीं पुण्यतिथि है। 10 जुलाई 1971 को उनका महाप्रयाण हुआ था। समय-समय पर यह प्रश्न उठता है कि 21वीं सदी में भिखारी ठाकुर की प्रासंगिकता क्या है? यदि उनके जीवन और साहित्य का गंभीर अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि उनके विचार आज भी समाज को दिशा देने की क्षमता रखते हैं।

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भिखारी ठाकुर का जन्म एक अत्यंत साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर नाई (हजाम) परिवार में हुआ था। उस समय उनके समाज का पारंपरिक पेशा दाढ़ी बनाना, नेवता बाँटना तथा विवाह और श्राद्ध जैसे सामाजिक कार्यों में हजामी करना था। तत्कालीन सामंती व्यवस्था इस समुदाय को हेय दृष्टि से देखती थी।

सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास और रूढ़ियों के खिलाफ जनजागरण के उद्देश्य से भिखारी ठाकुर ने अपनी नाच पार्टी का गठन किया। शुरुआती दौर में उन्हें जमींदारों और सामंतों के विरोध तथा उपेक्षा का सामना करना पड़ा, हालांकि उनके नाटकों और प्रस्तुतियों का आनंद वही समाज भी लेता था।

अपने नाटकों, गीतों और लोकनाट्य के माध्यम से उन्होंने बेमेल विवाह, दहेज, नशाखोरी, पारिवारिक कलह, जातीय भेदभाव, सांप्रदायिकता और सामाजिक विषमता  जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। समाज सुधार के इस अभियान में उन्हें कई बार अपमान भी सहना पड़ा, लेकिन वे अपने उद्देश्य से कभी विचलित नहीं हुए। यही कारण है कि वे भोजपुरी समाज में सामाजिक पुनर्जागरण के प्रतीक बन गे।

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आज जिन विषयों पर साहित्य और समाज में व्यापक विमर्श होता है- जैसे स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, सामाजिक समानता और शोषण के विरुद्ध संघर्ष उनकी स्पष्ट झलक भिखारी ठाकुर के साहित्य में दशकों पहले ही दिखाई देती है। उनके प्रसिद्ध नाटक 'बिदेसिया', 'बेटी बेचवा', 'विधवा विलाप' और 'गोबरघिचोर' समाज में महिलाओं की पीड़ा, सामाजिक अन्याय और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण करते हैं। उनकी नाट्य मंडली में दलित और पिछड़े वर्गों के कलाकारों को भी महत्वपूर्ण स्थान मिलता था, जो उस समय सामाजिक समानता का एक साहसिक उदाहरण था।

भिखारी ठाकुर ने मनोरंजन को केवल हँसी-ठिठोली तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज सुधार का माध्यम बनाया। उनका 'लौंडा नाच' स्वस्थ लोक मनोरंजन की परंपरा का प्रतीक था, जिसमें सामाजिक संदेश प्रमुख होता था।

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वर्तमान समय में भोजपुरी संगीत और मनोरंजन के एक हिस्से में बढ़ती अश्लीलता को लेकर लगातार बहस होती रही है। ऐसे दौर में भिखारी ठाकुर का साहित्य और उनकी सांस्कृतिक दृष्टि एक स्वस्थ, सामाजिक और संवेदनशील लोक संस्कृति का विकल्प प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि उनके विचार और रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उनके जीवनकाल में थीं।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर को "भोजपुरी का अनगढ़ हीरा" कहा था, जबकि प्रख्यात कवि-चिंतक प्राचार्य मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने उन्हें "भोजपुरी नाटकों का शेक्सपियर" की संज्ञा दी थी। यह सम्मान उनके साहित्यिक और सामाजिक योगदान का प्रमाण है।

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प्रो॰ डॉ॰ लालबाबू यादव का लेखक परिचय (Author Bio)


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