छपरा के बीचों-बीच आस्था का केंद्र है माँ काली मंदिर, 200 साल पुरानी है मान्यता
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छपरा-सीवान राष्ट्रीय मुख्य मार्ग के किनारे स्थित माँ काली का भव्य मंदिर शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। भगवान बाजार जंक्शन से कुछ ही दूरी पर स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। बता दें कि जिस सड़क पर आज यह मंदिर स्थित है, वहां पहले मालगोदाम हुआ करता था। इस वजह से यह सड़क मालगोदाम रोड के नाम से जानी जाती थी, लेकिन अब काली मंदिर रोड के नाम से प्रसिद्ध है।
माँ काली का यह मंदिर करीब दो सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस क्षेत्र में जब कभी खुदाई का काम चल रहा था, उसी दौरान मां काली की प्रतिमा मिली थी। इसके बाद यहां मंदिर का निर्माण कराया गया। समय के साथ मंदिर समिति और सदस्यों के प्रयास से इसे भव्य स्वरूप दिया गया। अब यहां आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ दूर-दराज के जिलों और पड़ोसी राज्यों पश्चिम बंगाल व झारखंड से भी श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
शहर के मध्य और मुख्य सड़क के किनारे स्थित होने के कारण मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है। मंदिर सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। मान्यता है कि भक्त सच्चे मन से मां काली की पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना मांगते हैं तो मां उनकी मुराद पूरी करती हैं।
मंगलवार और शनिवार को उमड़ती है भीड़
माँ काली मंदिर के ठीक बगल में हनुमान जी की प्रतिमा भी स्थापित है। मंगलवार और शनिवार को यहां श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ देखने को मिलती है। शनिवार को मंदिर परिसर में प्रसाद के रूप में खिचड़ी का वितरण किया जाता है, जबकि सोमवार और शुक्रवार को खीर का प्रसाद मिलता है। मंदिर की खासियत यह भी है कि अलग-अलग दिनों में अलग-अलग प्रकार के प्रसाद का वितरण किया जाता है।
विशाल नीम का पेड़ भी आस्था का हिस्सा
मंदिर परिसर में एक पुराना और विशाल नीम का पेड़ भी है। स्थानीय लोगों की आस्था इस नीम के पेड़ से भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि इसका संबंध मां काली से है। श्रद्धालु मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ इस पेड़ के प्रति भी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
आमतौर पर मां काली के मंदिर गांव या बस्ती के अंदर देखने को मिलते हैं, लेकिन छपरा का यह मंदिर मुख्य सड़क के किनारे शहर के बीचों-बीच स्थित है। मंदिर के इस स्वरूप को लेकर पुजारी सुशील पांडेय बताते हैं कि यहां मां काली दक्षिणेश्वरी काली के स्वरूप में विराजमान हैं।
वहीं, स्थानीय लोगों के अनुसार रतनपुरा-दौलतगंज क्षेत्र पहले नदी के किनारे बसा हुआ था और मंदिर के दूसरी तरफ बस्ती का क्षेत्र था। बाद में शहर के विस्तार और सड़क निर्माण के साथ आसपास का स्वरूप बदलता गया और नई बस्तियां विकसित होती गईं। इसी वजह से आज मंदिर मुख्य सड़क के बिल्कुल करीब दिखाई देता है।
दशहरा, नवरात्र और काली पूजा में दिखती है भव्यता
दशहरा और काली पूजा के अवसर पर मंदिर की विशेष सजावट की जाती है। इन पर्वों के दौरान मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां काली की पूजा-अर्चना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में विधि-विधान से हवन, पूजन, दुर्गा सप्तशती पाठ और कीर्तन जैसे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान होने वाले हवन-भजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना करते हैं।
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शहर की व्यस्तता के बीच मुख्य सड़क के किनारे स्थित यह प्राचीन मंदिर आज भी अपनी धार्मिक परंपरा, मान्यताओं और श्रद्धालुओं की आस्था को संजोए हुए है।






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