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अगस्त क्रांति के विस्मृत नायक: दाउदपुर के गिरी बंधुओं की अमर गाथा

अगस्त क्रांति के विस्मृत नायक: दाउदपुर के गिरी बंधुओं की अमर गाथा, शहादत के 84 साल बाद भी सम्मान की बाट जोहते परिवार

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों से लोहा लेने वाले छठू गिरी, कामता गिरी और फागु गिरी ने दी थी शहादत; स्मारक के नाम पर एक स्तंभ, परिवार आज भी सरकारी सम्मान और सहायता की उम्मीद में

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष | धर्मेन्द्र रस्तोगी

दाउदपुर सारण में 1942 के अमर शहीद छठू गिरी, कामता गिरी और फागु गिरी की स्मृति में बना शहीद स्मृति-स्तंभ

देश आज स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। हर ओर तिरंगा लहरा रहा है और आजादी के उन वीरों को याद किया जा रहा है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से देश को मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इसी इतिहास का एक अध्याय सारण के दाउदपुर की मिट्टी में भी दफन है जहां 1942 की अगस्त क्रांति में एक ही परिवार की पीढ़ी के तीन वीरों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लिया और देश के लिए अपनी जान दे दी।

छठू गिरी, कामता गिरी और फागु गिरी: दाउदपुर के ये तीन नाम स्थानीय लोगों और शहीद स्मारक समिति की स्मृतियों में आज भी अमर हैं। अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इन वीरों ने सरकारी प्रतिष्ठानों के विरोध से लेकर तिरंगा फहराने तक के आंदोलनों में हिस्सा लिया। अंग्रेजी हुकूमत के दमन का सामना किया और अंततः गोलियों का शिकार होकर शहीद हो गए।

आज उनकी शहादत को 84 वर्ष बीत चुके हैं। गांव में उनकी स्मृति में एक स्तंभ खड़ा है, लोग श्रद्धा से वहां पहुंचते हैं, लेकिन शहीद परिवारों के सम्मान, आर्थिक सहायता और स्मारक को उचित पहचान दिलाने की मांग अब भी उठती रही है।

किशोर उम्र में ही देशभक्ति के रास्ते पर चल पड़े थे छठू गिरी

दाउदपुर और आसपास के इलाके में स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का प्रभाव पहले से ही था। वर्ष 1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान मांझी के बरेजा गांव में पंडित जवाहरलाल नेहरू आये थे। जिसका स्थानीय इतिहास में उल्लेख मिलता है। इसी दौर के राष्ट्रीय आंदोलन ने इलाके के युवाओं में आजादी की चेतना पैदा की।

बताया जाता है कि महज 14-15 वर्ष की उम्र में छठू गिरी भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। वे चरखा समिति के अध्यक्ष बने और अंग्रेजी शासन के खिलाफ गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा, जहां उन्होंने करीब छह महीने बिताए।

लेकिन जेल की यातनाएं भी उनके भीतर पैदा हुए आजादी के जुनून को नहीं दबा सकीं।

भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ तेज किया संघर्ष

दाउदपुर के शहीद स्मृति-स्तंभ पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अर्पित किए गए फूल

साल 1942... महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद देशभर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन तेज हो चुका था। बिहार में भी इसका व्यापक असर पड़ा। सारण और आसपास के इलाकों में छात्र, युवा और आम लोग अंग्रेजी शासन के प्रतीकों और सरकारी संस्थानों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए।

दाउदपुर के छठू गिरी, उनके भतीजे कामता गिरी और फागु गिरी भी इसी आंदोलन का हिस्सा बने। स्थानीय शहीद स्मारक समिति और ग्रामीणों के अनुसार, तीनों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आंदोलनकारियों ने दाउदपुर रेलवे स्टेशन और पोस्ट ऑफिस को ध्वस्त किया तथा सरकारी व्यवस्था के खिलाफ विरोध तेज किया। इसके बाद आंदोलन की आग सिवान तक पहुंची, जहां हजारों छात्रों और युवाओं के साथ सरकारी कार्यालय और डाकघर पर तिरंगा फहराने का प्रयास किया गया।

उग्र होते आंदोलन से अंग्रेजी प्रशासन बौखला उठा। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर कार्रवाई की। इसी दमन के दौरान छठू गिरी शहीद हुए। स्थानीय स्मृतियों और शहीद स्मारक समिति के अनुसार, कामता गिरी और फागु गिरी को भी अंग्रेजी पुलिस ने गोलियों से भून दिया।

आजादी का सपना आंखों में लिए इन तीनों वीरों ने अपने प्राण देश के नाम कर दिए।

दाउदपुर में आज भी मौजूद है शहादत की निशानी

दाउदपुर में अमर शहीद छठू गिरी, कामता गिरी और फागु गिरी की स्मृति में बना स्तंभ और तिरंगा

दाउदपुर में इन अमर शहीदों की स्मृति को संजोए एक स्मृति-स्तंभ मौजूद है। स्तंभ के आसपास लगे चित्र और 1942 के आंदोलन से जुड़ी स्मृतियां आज भी उस दौर की कहानी कहती हैं।

स्वतंत्रता दिवस और शहादत दिवस जैसे अवसरों पर स्थानीय लोग यहां पहुंचकर पुष्प अर्पित करते हैं। लेकिन स्थानीय शहीद स्मारक समिति का कहना है कि इन शहीदों को सरकारी स्तर पर वह सम्मान और पहचान अब तक नहीं मिल सकी, जिसके वे हकदार हैं।

समिति के अनुसार, शहीदों की स्मृति में सरकारी स्तर पर शहादत दिवस मनाने, स्मृति स्थल को उचित पहचान देने और शहीद परिवारों को सहायता उपलब्ध कराने की मांग लंबे समय से की जा रही है।

84 साल बाद भी परिवारों के सामने आर्थिक मुश्किलें

देश की आजादी के लिए अपनी जान देने वाले इन वीरों के परिवारों की वर्तमान स्थिति इस कहानी का सबसे पीड़ादायक पक्ष है।

स्थानीय शहीद स्मारक समिति के अनुसार, तीनों शहीद परिवार आज भी आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। आजादी की लड़ाई में जिन परिवारों ने अपने बेटे खोए, उनके वंशजों के लिए सम्मान और सहायता का सवाल आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

छठू गिरी का परिवार

बलभद्र गिरी के दो पुत्र थे—छठू गिरी और हीरा गिरी। छठू गिरी की शहादत के बाद उनकी पत्नी यमुना देवी ने अपने देवर हीरा गिरी के पुत्र सीताराम गिरी को गोद लिया था।

सीताराम गिरी के निधन के बाद उनकी पत्नी बसंती देवी गांव के नवसृजित प्राथमिक विद्यालय में रसोइया के रूप में काम कर किसी तरह अपना परिवार चला रही हैं।

एक शहीद परिवार की यह तस्वीर आजादी के दशकों बाद भी कई सवाल छोड़ जाती है।

कामता गिरी का परिवार

जीव नंदन गिरी के चार बेटों में दूसरे पुत्र कामता गिरी थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया और शहीद हो गए।

उनके छोटे भाई नवल किशोर गिरी आज भी उस दौर की घटनाओं को याद करते हैं। परिवार के लिए 1942 इतिहास की कोई दूर की घटना नहीं, बल्कि अपने घर के सदस्य की शहादत की जीवित स्मृति है।

फागु गिरी का परिवार

परीक्षण गिरी के सात पुत्रों में छठे पुत्र फागु गिरी थे। देश की आजादी के लिए उन्होंने भी अपने प्राणों की आहुति दी।

स्थानीय समिति का कहना है कि देश के लिए जान गंवाने वाले इन परिवारों को आज भी आर्थिक और बुनियादी सुविधाओं के स्तर पर अपेक्षित सहायता नहीं मिल सकी है।

35 वर्षों से शहीदों की पहचान के लिए संघर्ष कर रही समिति

शहीद स्मारक समिति के सचिव सुमन गिरी का कहना है कि समिति पिछले करीब 35 वर्षों से दाउदपुर के इन गुमनाम नायकों की स्मृति को जीवित रखने का प्रयास कर रही है।

उनके अनुसार, समिति लंबे समय से इस दिन को ‘सद्भावना दिवस’ के रूप में मनाती आ रही है। समय-समय पर कई बड़े नेता, मंत्री और सामाजिक हस्तियां स्मृति स्थल पर पहुंचीं। सम्मान और विकास को लेकर आश्वासन भी मिले, लेकिन सरकारी स्तर पर शहादत दिवस मनाने की मांग अब तक पूरी नहीं हुई।

समिति का कहना है कि इस मांग को लेकर कई बार धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल भी की गई, लेकिन अपेक्षित सरकारी पहल नहीं हुई।

समिति के संरक्षक प्रो. ओमप्रकाश सिंह और कामरेड अरुण कुमार ने भी दाउदपुर के अमर शहीदों को उचित सम्मान देने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि सरकार ने शहीदों के सम्मान, शहादत दिवस को सरकारी मान्यता और परिवारों को आर्थिक सहायता के मुद्दे पर जल्द पहल नहीं की, तो समिति बड़े जनआंदोलन का रास्ता अपनाएगी।

सवाल सिर्फ सम्मान का नहीं, इतिहास को बचाने का भी

दाउदपुर के छठू, कामता और फागु गिरी की कहानी सिर्फ तीन शहीदों की कहानी नहीं है। यह उन असंख्य स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी है, जिनका योगदान राष्ट्रीय इतिहास के बड़े पन्नों में भले ही सीमित रह गया, लेकिन जिन्होंने गांव-कस्बों में आजादी की लड़ाई को मजबूती दी।

आज जब स्वतंत्रता दिवस पर पूरा देश उन वीरों को नमन कर रहा है, दाउदपुर का यह स्मृति-स्तंभ भी आने वाली पीढ़ियों को एक कहानी सुनाता है—उस दौर की, जब आजादी महज एक सपना थी और उस सपने के लिए युवाओं ने अपनी जिंदगी तक दांव पर लगा दी थी।

छठू गिरी, कामता गिरी और फागु गिरी ने आजाद भारत देखने के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं। अब जिम्मेदारी आजाद भारत की है कि वह उन आंखों के सपने और उन परिवारों की कुर्बानी को विस्मृति में न जाने दे।

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दाउदपुर की यह कहानी इसलिए भी याद रखी जानी चाहिए, क्योंकि आजादी का इतिहास केवल बड़े नेताओं और बड़े शहरों का इतिहास नहीं है। इसकी असली ताकत उन गांवों और परिवारों में भी छिपी है, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया।

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