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पांच साल बाद जेल से बाहर आएगी बबली खातून, बेटे की हत्या के आरोप से बरी

 कोर्ट न्यूज 

पांच साल से अधिक जेल में रही मां को मिली बेगुनाही की आजादी, दो वर्षीय पुत्र की हत्या के आरोप से बरी

बबली खातून मामले में बचाव पक्ष के मुख्य डिफेंस काउंसिल पूर्णेन्दु रंजन की फाइल फोटो

छपरा, 28 अगस्त | कानून को अक्सर अंधा कहा जाता है, लेकिन उसकी असली ताकत इस बात में है कि वह चेहरे, रिश्ते और परिस्थितियों से नहीं, बल्कि साक्ष्यों और कानून के आधार पर फैसला करता है। छपरा व्यवहार न्यायालय से आया एक फैसला इसी बात की मिसाल बना है। अपने ही दो वर्षीय पुत्र की हत्या के आरोप में पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद महिला को अदालत ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है।

प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनंत कुमार सिंह की अदालत ने डोरीगंज थाना कांड संख्या-55/21 एवं सत्र वाद संख्या-369/21 में आरोपी बबली खातून को उसके दो वर्षीय पुत्र की हत्या के आरोप से निर्दोष मानते हुए रिहाई का आदेश दिया है। बबली खातून 3 मार्च 2021 से मंडल कारा, छपरा में न्यायिक हिरासत में थी। अदालत के फैसले के बाद उसे उस आरोप से मुक्ति मिली, जिसने पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से उसकी जिंदगी को सलाखों के पीछे कैद कर रखा था।

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका

आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण बबली खातून के मामले की पैरवी जिला विधिक सेवा प्राधिकार के तहत लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम (LADCS) को सौंपी गई थी। मामले में मुख्य डिफेंस काउंसिल पूर्णेन्दु रंजन ने बचाव पक्ष की ओर से अदालत के समक्ष उपलब्ध तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी बिंदुओं को मजबूती से रखा।

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कुल सात गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियुक्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सके।

इसके बाद अदालत ने बबली खातून को आरोपों से बरी करते हुए उसकी रिहाई का आदेश दिया।

आरोप लगना दोष सिद्ध होना नहीं

अदालत का यह फैसला केवल एक महिला की रिहाई का आदेश नहीं, बल्कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में साक्ष्यों की अहमियत को भी रेखांकित करता है। जिस आरोप के चलते बबली खातून ने वर्षों जेल में बिताए, उसी मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसे दोषमुक्त कर दिया।

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LADCS के माध्यम से मिली कानूनी सहायता ने आर्थिक रूप से कमजोर महिला को अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखने और न्याय पाने का अवसर दिया। फैसला एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि केवल आरोप लग जाने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता। किसी अपराध को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है और जब आरोप पर्याप्त साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होते, तो आरोपी को कानून के तहत दोषमुक्ति का लाभ मिलता है।

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