जन्म जयंती पर विशेष | साहित्य
भगवती चरण वर्मा की ‘चित्रलेखा’: पाप-पुण्य से आगे जीवन को समझने की कोशिश
हिंदी साहित्य के उन रचनाकारों में भगवती चरण वर्मा का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है, जिन्होंने मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व, प्रेम, नैतिकता और जीवन की जटिलताओं को अपनी रचनाओं में बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
ऐसे तो वर्मा जी की लेखनी ने हिंदी साहित्य को कई यादगार रचनाएं दीं, जिनमें ‘भूले-बिसरे चित्र’, ‘सामर्थ्य और सीमा’, ‘सबहिं नचावत राम गोंसाईं’, ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ और ‘अपने खिलौने’ प्रमुख हैं। ‘भूले-बिसरे चित्र’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया। वर्ष 1978 में वे राज्यसभा के लिए मनोनीत हुए।
लेकिन उनकी रचनाओं में ‘चित्रलेखा’ की बात ही अलग है।
‘चित्रलेखा’ केवल एक कहानी नहीं है। यह मनुष्य के कर्म, उसकी इच्छाओं, परिस्थितियों और नैतिक मान्यताओं को समझने का एक ऐसा प्रयास है, जो पाठक को पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक सोचने के लिए विवश करता है।
पाप क्या है और पुण्य क्या? क्या कोई कर्म अपने आप में पाप या पुण्य होता है, या उसके पीछे की परिस्थितियां और मनुष्य की भावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है? भगवती चरण वर्मा ने इन सवालों को जिस खूबसूरती से सामने रखा है, वह इस उपन्यास को केवल रोचक ही नहीं, बल्कि विचारोत्तेजक भी बनाता है।
कहा जाता है कि अगर वकालत को समझना है, तो भगवती चरण वर्मा का कालजयी उपन्यास ‘चित्रलेखा’ जरूर पढ़िए। इस बात को चाहे जिस संदर्भ में कहा गया हो, लेकिन ‘चित्रलेखा’ पढ़ते हुए इतना जरूर महसूस होता है कि मनुष्य और समाज को समझने के लिए कानून की किताबों से अलग एक मानवीय दृष्टि की भी जरूरत होती है।
इस उपन्यास में पाप और पुण्य की जो पड़ताल है, वह पाठक को अपने आसपास के समाज और अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। यही भगवती चरण वर्मा की लेखनी की खूबी है। वे केवल कहानी नहीं कहते, बल्कि कहानी के बहाने ऐसे प्रश्न छोड़ जाते हैं, जिनके उत्तर पाठक को स्वयं तलाशने पड़ते हैं।
वैसे तो उनके अन्य उपन्यास भी बेहद रोचक हैं, लेकिन ‘चित्रलेखा’ की बात ही अलग है। एक बार पढ़ने बैठ जाइए तो मन करता है कि इसे पूरा किए बिना उठें ही नहीं। कहानी जिस तरह आगे बढ़ती है, वह पाठक की जिज्ञासा लगातार बनाए रखती है।
मेरी पढ़ी और मुझे प्रेरित करने वाली पुस्तकों में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ‘रश्मिरथी’ के अलावा ‘चित्रलेखा’ का भी विशेष स्थान है। एक को पढ़ने से ऊर्जा मिलती है, तो दूसरे से समाज और मनुष्य के स्वभाव को समझने की दृष्टि।
जिन मित्रों ने अभी तक ‘चित्रलेखा’ नहीं पढ़ी है, उनसे मेरा आग्रह है कि एक बार जरूर पढ़िए। तब शायद आप समझ पाएंगे कि किसी पुस्तक को कालजयी क्यों कहा जाता है।
और हां... एक छोटी-सी सलाह।
‘चित्रलेखा’ का अंतिम पृष्ठ पहले मत पढ़िएगा।
किताब पढ़ते-पढ़ते बार-बार मन करेगा कि आखिर अंत में क्या होने वाला है। जिज्ञासा आपको अंतिम पन्ने तक पहुंचने से पहले ही उसे देखने के लिए मजबूर करेगी। लेकिन थोड़ा धैर्य रखिए।
क्योंकि ‘चित्रलेखा’ को केवल पढ़ना नहीं है, उसे धीरे-धीरे समझना भी है। पुस्तक के अंत तक पहुंचने की प्रक्रिया ही उसके अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भगवती चरण वर्मा की रचनाएं आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि इंसान के मन, उसकी इच्छाएं, कमजोरियां और संघर्ष समय के साथ बहुत नहीं बदले हैं। समाज बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं, लेकिन मनुष्य के भीतर के कई सवाल आज भी वही हैं।
शायद यही किसी रचना के कालजयी होने की सबसे बड़ी कसौटी है—वह अपने समय की कहानी कहते हुए आने वाली पीढ़ियों से भी संवाद करती रहे।
साहित्य बदलते समय को दर्ज करता है, लेकिन महान साहित्य इंसान को समझने में मदद करता है।
और आज इस महान साहित्यकार को याद करने का एक खास अवसर भी है।
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आज हिंदी साहित्य के ऐसे कालजयी रचनाकार भगवती चरण वर्मा की जन्म जयंती है। उनका जन्म 30 अगस्त 1903 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में हुआ था।
हिंदी साहित्य के इस महान रचनाकार की जन्म जयंती पर उन्हें सादर नमन!


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