नाट्य महोत्सव | भोजपुरी
छपरा में पुरबिया रंग नाट्य महोत्सव का आगाज, ‘रामलीला’ ने बांधा समां
छपरा, 22 अगस्त | शहर के भिखारी ठाकुर प्रेक्षागृह में शुक्रवार से तीन दिवसीय पुरबिया रंग नाट्य महोत्सव-2026 का शुभारंभ हुआ। कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार के निर्देश पर आयोजित महोत्सव का उद्घाटन पूर्व कला एवं संस्कृति मंत्री सह मढ़ौरा विधायक जितेंद्र राय ने दीप प्रज्वलित कर किया।
उद्घाटन समारोह में जिला जज राघवेंद्र सिंह परमार, जिला जज सांची मिश्रा, स्थायी लोक अदालत के जिला जज कृष्ण मोहन तिवारी, जेएमएफसी साक्षी प्रखर, सारण जिला डालसा के सचिव राजीव कुमार, अनीता सिंह, डीसीएलआर सदर आलोक कुमार और जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी डॉ. विभा भारती सहित अन्य अतिथि मौजूद रहे। अतिथियों का स्वागत जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी विभा भारती ने किया।
पहले दिन हुआ ‘रामलीला’ का मंचन
महोत्सव के पहले दिन मुंशी प्रेमचंद रचित ‘रामलीला’ नाटक का मंचन किया गया। छपरा के युवा रंग निर्देशक मोहम्मद जहांगीर के निर्देशन में कलाकारों ने नाटक की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। मंचन के दौरान कलाकारों के अभिनय और प्रस्तुति ने दर्शकों को प्रभावित किया।
तीन विभूतियों को मिला पुरबिया रंग सम्मान
महोत्सव के मंच पर सारण की तीन विभूतियों को ‘पुरबिया रंग सम्मान-2026’ से सम्मानित किया गया। चित्रकार मेहदी शॉ, भोजपुरी एवं लोक संगीत के साधक उदय नारायण सिंह तथा समाजसेवी एवं जयप्रकाश विश्वविद्यालय के पूर्व एनएसएस समन्वयक डॉ. विद्या वाचस्पति त्रिपाठी को कला, संस्कृति और समाज के क्षेत्र में उनके आजीवन योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया गया।
इन कलाकारों ने दी प्रस्तुति
‘रामलीला’ के मंचन में गोविंद कुमार, सोनू कुमार, विक्की ज्वेल, शिवम कुमार मिश्रा, अनुपम कुमार शाह, विक्की कुमार, हरिनंदन कुमार, हिमांशु कुमार, शिव कुमार, विक्रम कुमार, सिमरन और महिमा ने अभिनय किया।
वाद्य यंत्रों पर उत्पल कुमार, हारमोनियम पर आसिफ अली, नगाड़े पर मिथलेश कुमार तथा स्वर सहयोग में मुकेश कुमार और व्रजराज कुमार ने योगदान दिया। रूप सज्जा जितेंद्र जीत्नु, प्रकाश परिकल्पना विनय कुमार और वस्त्र विन्यास महिमा एवं सुल्तान परवीन ने संभाला। नाटक का निर्देशन मोहम्मद जहांगीर ने किया।
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तीन दिवसीय यह महोत्सव 21 से 23 अगस्त तक आयोजित किया जा रहा है। महोत्सव के माध्यम से भोजपुरी लोक संस्कृति, साहित्य और रंगमंच की परंपरा को बढ़ावा देने के साथ नई पीढ़ी को लोक कला से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।




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