खेल दिवस | बैडवाटर 135 रिकॉर्ड धारक भारतीय
शैलेश कुमार: छपरा के साधारण किसान परिवार से दुनिया की सबसे कठिन 'बैडवाटर-135' अल्ट्रा-मैराथन जीतने तक का सफर
सारण (बिहार), 29 अगस्त | जिंदगी में सफलता पाने के लिए उम्र और संसाधन कभी रुकावट नहीं बनते, बशर्ते आपके भीतर कुछ कर दिखाने का जज्बा हो। बिहार के सारण जिले के गड़खा प्रखंड स्थित कमालपुर गांव के रहने वाले शैलेश कुमार ने इस बात को दुनिया भर में सच साबित कर दिया है। साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले और वर्तमान में भारतीय नौसेना (कोच्चि) में सेवारत शैलेश ने अमेरिका की ‘डेथ वैली’ (मृत्यु घाटी) में आयोजित दुनिया की सबसे कठिन मानी जाने वाली बैडवाटर-135 अल्ट्रा-मैराथन को फतह कर इतिहास रच दिया है।
अदम्य साहस और ऐतिहासिक उपलब्धि
कैलिफोर्निया की झुलसा देने वाली भीषण गर्मी और बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच आयोजित 135 मील (लगभग 217 किमी) लंबी इस दौड़ को दुनिया की सबसे खतरनाक पैदल स्पर्धाओं में गिना जाता है। शैलेश कुमार ने मात्र 29 घंटे 28 मिनट 37 सेकंड के अविश्वसनीय समय में इस दूरी को पूरा किया। इसके साथ ही वह इस प्रतिष्ठित स्पर्धा को सबसे तेज समय में पूरा करने वाले पहले भारतीय बन गए हैं। इस मुकाम को हासिल करने के लिए उन्होंने छह महीने तक लगातार अभ्यास करते हुए 3000 किलोमीटर से अधिक की ट्रेनिंग दूरी तय की थी।
संघर्षों से भरा शुरुआती जीवन और नौसेना का सफर
शैलेश के पिता बिंदेश्वरी प्रसाद एक किसान हैं। चार भाइयों में सबसे छोटे शैलेश का बचपन गांव की गलियों और खेतों के बीच बीता, जहां संसाधनों की भारी कमी थी। बेहतर भविष्य और देश सेवा की चाहत उन्हें साल 2013 में भारतीय नौसेना में ले आई। नौसेना की अनुशासित जीवनशैली और विभागीय प्रोत्साहन ने उनके भीतर छिपे एथलीट को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज की बड़ी सफलताएं
- स्पार्टाथलॉन (ग्रीस): ग्रीस की बेहद कठिन 246 किमी लंबी ऐतिहासिक मैराथन को मात्र 33 घंटे 56 मिनट 22 सेकंड में पूरा किया।
- प्रमुख खिताब: 'फोर्ट अल्ट्रा 100 माइल्स', 'व्हाइट सैंड अल्ट्रा' और 'हेनर बंबू अल्ट्रा' जैसी प्रतियोगिताओं में जीत हासिल कर कोर्स रिकॉर्ड बनाए।
- विविध ट्रैक: सोलंग स्काई अल्ट्रा, मलनाड अल्ट्रा, डेक्कन अल्ट्रा और ला अल्ट्रा (111 किमी) जैसी दुर्गम पर्वतीय दौड़ में भी शानदार प्रदर्शन किया।
शैलेश कुमार के लिए रनिंग केवल पसीना बहाने या मेडल जीतने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह इसे आत्म-अनुशासन और जिंदगी जीने का एक खूबसूरत तरीका मानते हैं। उनकी यह सफलता देश के उन तमाम युवाओं के लिए एक मजबूत प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का हौसला रखते हैं।
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