पहली ही बारिश ने छपरा की बदहाल व्यवस्था की तस्वीर सामने रख दी है. जलजमाव, टूटी सड़कें और गंदगी केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का भी आईना हैं.
हर बरसात, वही कहानी... बूंद-बूंद पूछ रही है: जिम्मेदार कौन?
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मानसून का आगमन देश के अधिकांश हिस्सों में राहत और खुशहाली का संदेश लेकर आता है. किसान इसकी पहली बारिश को नई उम्मीदों की तरह देखते हैं. अच्छी वर्षा देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी शुभ संकेत मानी जाती है. लेकिन विडंबना यह है कि यही मानसून बिहार के कई शहरों, विशेषकर छपरा, के लोगों के लिए राहत नहीं बल्कि परेशानी, अव्यवस्था और भय का कारण बन जाता है.
इस वर्ष मानसून की शुरुआती बारिश ने ही छपरा नगर निगम की तैयारियों की पोल खोल दी है. शहर के ब्रह्मपुर से भिखारी चौक तक, जगदम कॉलेज से लेकर साढ़ा तक शायद ही कोई ऐसा प्रमुख मार्ग हो, जहां जलजमाव की समस्या न दिखी हो. टूटी-फूटी सड़कें बारिश के बाद और अधिक खतरनाक हो जाती हैं. गड्ढों में भरा पानी दुर्घटनाओं को न्योता देता है, जबकि नालों का गंदा पानी सड़कों पर फैलकर पूरे इलाके को बदबू और बीमारियों के खतरे में बदल देता है. सड़कों पर तैरता कचरा केवल नगर व्यवस्था की बदहाली नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असफलता का भी प्रतीक है.
यह तो अभी मानसून की शुरुआत है. यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में पिछले वर्ष जैसी बाढ़ और जलजमाव की स्थिति दोबारा देखने को मिल सकती है. पिछली बरसात में शहर के कई इलाकों में लोगों को कई दिनों तक बिजली और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ा. घरों में पानी घुस गया, लोगों का सामान्य जीवन ठप हो गया और व्यापारियों को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हर वर्ष वही समस्याएं दोहराई जाती हैं, लेकिन समाधान कहीं दिखाई नहीं देता.
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आखिर क्या कारण है कि जो मानसून किसानों के लिए मुस्कान लेकर आता है, देश की आर्थिक स्थिति के लिए जरूरी बताया जाता है हम छपरा/ बिहार वासियों के लिए दु:खों का पहाड़ बन जाता है. बिजली चली जाती है, पीने के लिए शुद्ध पानी तक नहीं मिलता, घरों में पानी घुस जाता है, घर से निकलना मुश्किल हो जाता है जैसे तमाम समस्याएं घेरे रहती है. आखिर कब हम इस श्राप से मुक्त होंगे व मानसून/ सावन का आनन्द ले सकेंगें?
सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है. वार्ड पार्षद, मेयर, विधायक, सांसद और प्रशासन—सभी जनता के प्रतिनिधि और संरक्षक हैं. यदि हर वर्ष एक जैसी समस्याएं सामने आती हैं, तो आखिर जवाबदेही किसकी तय होगी? करोड़ों रुपये विकास योजनाओं पर खर्च होने के बावजूद यदि शहर पहली ही बारिश में डूब जाए, तो यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक विफलता भी है.
हालांकि पूरी जिम्मेदारी केवल सरकार या नगर निकाय पर डाल देना भी उचित नहीं होगा. शहर की इस बदहाली के पीछे हम नागरिक भी कम दोषी नहीं हैं. नालों, फुटपाथों और जल निकासी के प्राकृतिक मार्गों पर अतिक्रमण लगातार बढ़ा है. जहां कभी वर्षा का पानी एकत्र होता था, वहां आज बिना पर्याप्त आधारभूत सुविधाओं के मकान खड़े हो गए हैं. कूड़ा-कचरा नालों में फेंकना भी आम बात हो गई है. परिणामस्वरूप बारिश का पानी निकलने का रास्ता नहीं पाता और पूरा शहर जलमग्न हो जाता है.
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इसलिए अब समय केवल आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी निभाने का है. सरकार को चाहिए कि पक्ष और विपक्ष, जनप्रतिनिधियों, नगर निकाय, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों को एक मंच पर लाकर शहरों की जलनिकासी व्यवस्था के लिए दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार करे. अतिक्रमण के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो, नालों की नियमित सफाई सुनिश्चित की जाए, विकास योजनाओं की स्वतंत्र निगरानी हो और नगर निकाय के अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट जवाबदेही तय की जाए. तब जाकर हम एक स्वच्छ, सुन्दर व स्वस्थ शहर की कल्पना कर सकते है. तब शहरों की जनता भी मानसून के लिए बाहें फैला कर स्वागत में खड़ी रह सकती है और कह सकती है सावन को आने दो...
— अजय गुप्ता | संपादक, काँव-काँव न्यूज़


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